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क्या लगभग हर शताब्दी में ऐसा होता ही है?

Corona Virus

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इसमें कोई दोराय नहीं कि वर्ष 2020 किसी त्रासदी से कम नहीं है। COVID 19 ने शुरुआती दौर में ही दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया था। जिसका कहर अभी तक जारी है और दुनिया भर के देशों ने पहले ही इसके सामने अपने घुटने टेक दिए है। फिर चाहे कौन सा देश विकास के किस पायदान पर खड़ा है, इस बात

Corona Virus
कोरोना वायरस की सांकेतिक तस्वीर

से कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि COVID 19 का जन्मदाता चीन को कहा जा रहा है और बताया जा रहा है कि इस भयंकर वायरस का असली स्रोत पोल्ट्री फर्म है। शोध की मानें तो आमतौर पर यह कोरोना वायरस सांपों एवम् चमगादड़ में पाया जाता है और वहीं से ये इंसानों के अंदर आया है। असल में ये वायरस वाइरल प्रोटीन के साथ रिकॉमबिनेश के जरिए बना है। यह वायरल प्रोटीन वायरस को बॉडी की प्रोटीन सैल पर बाइंड करता है, जो इसके लिए रिसेप्टर का काम करती है। और इन सभी का परिणाम ये होता है कि व्यक्ति संक्रमित हो जाता है। वैसे तो इस वायरस के सबसे शुरूआती केस चीन के वुहान शहर में दिसंबर 2019 में ही देखने को मिले। और लापरवाही बरती गई आखिर किसको पता था कि ये लापरवाही 2020 के पहले चरण में ही धीरे धीरे इतना विराट रूप ले लेगी। जिसपर काबू पाना टेढ़ी खीर हो जाएगा।

-दुनिया में लगातार बढ़े संक्रमितों के आंकड़ें

दुनिया भर में अभी तक  लगभग 46 लाख 35 हजार से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित पाएं गए है, वहीं मौत का आंकड़ा भी लगभग 3 लाख 11 हजार पार कर चुका है। लेकिन अभी तक भी मनुष्य बुद्धि इसका कोई तोड़ नहीं निकाल पाई है और ये आंकड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। किसी को नहीं पता इस महामारी का अंत कब और कैसे होगा। अब चूंकि यह ह्यूमन टू ह्यूमन ट्रांसफर हो रही है तो लोगों को आपसी दूरी बनाए रखने, अपने मुंह को ढक कर रखने की और साफ सफाई का खास ध्यान रखने की हिदायत दी गई है। देखा जाए तो काफी हद तक ऐसा करने से सकारात्मक परिणाम देखने को मिले है। परिणाम स्वरूप सामाजिक दूरी कायम रखने के लिए ज्यादातर देशों में लॉकडाउन कर दिया गया और लोग अपने ही आशियानों में कैद होने के लिए मजबूर हो गए है और दुनिया ना सिर्फ कोरोना महामारी से अपितु आर्थिक संकट से भी जूझ रही है। लेकिन संक्रमण और मौत का ये आंकड़ा थमता नहीं दिखाई देता।
-लेकिन ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ पहली बार हुआ है, आज से करीब एक शताब्दी पहले भी दुनिया ने ऐसे जनाजे उठाए हैः
स्पेनिश फ्लू:
 दरअसल, 1918 में स्पेनिश फ्लू ने दुनिया भर में ऐसे ही कहर बरसाया था। जिसने दुनिया भर की तिहाई आबादी को अपनी चपेट में ले लिया था और करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। जिसमें से करीब 15 लाख लोग भारत के थे। आपको जानकर हैरानी होगी ये आंकड़ा पहले वर्ल्ड वॉर में हुई मौतों से भी चार गुना ज्यादा था। उस वक्त भी लोगों ने अपने आप को संक्रमण से बचाने के लिए मास्क का ही सहारा लिया था।
Spanish Flu
स्पेनिश फ्लू वायरस की सांकेतिक तस्वीर

स्पेनिश फ्लू ने सबसे पहले अमेरिका को निशाना बनाया था और उसके बाद ये दुनिया के बाकी हिस्सों यूरोप, अफ्रीका और एशिया में भी पहुंच गया। असल में ये एक इंफ्लुएंजा था अगर  नेशनल आर्काइव में मौजूद दस्तावेजों की मानें तो इस इन्फ्लुएंजा ने एक साल में दो अलग-अलग फेज में  हमला किया था। पहले चरण में ये शरीर में तीन दिन के बुखार के साथ दिखना शुरू हुआ, वो भी बिना किसी खास लक्षण के। और जैसे ही मरीज़ ठीक होने लगता इसका दूसरा फेज हमला कर देता। जिसके बाद  पीड़ित की मौत हो जाती थी। इसकी खास बात ये थी कि एक बार खत्म होने के बाद भी ये बीमारी 1919 में फिर से लौट आई थी।

स्पेनिश फ्लू को पहचान पाना मुश्किल था। उस दौर में इस महामारी के इलाज के लिए कोई सटीक दवा नहीं थी और न ही कोई वैक्सीन। बचाव के लिए प्रभावित इलाकों में लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई थी। उस वक्त भी लॉकडॉउन का ही सहारा लिया गया था। लेकिन इस महामारी ने किसी को नहीं छोड़ा था
कॉलेरा (हैजा):

कॉलेरा ने 1817 में उत्पात मचाया था। ये एक ऐसी महामारी थी, जिसने लगभग 180 लाख लोगों को मौत के घाट उतारा था। इससे हुई मौत को ‘ ब्लू डेथ’ कहा जाता है। दरअसल, हैजा एक बैक्टीरिया के कारण होता है, जो कि हमारे खाने या पानी से हमारे शरीर में पहुंचता है। यह मल-मूत्र और गंदगी से फैलता है।

Cholera Virus
कॉलेरा वायरस की सांकेतिक तस्वीर
कॉलेरा के लक्षण अलग-अलग लोगों में अलग-अलग देखे गए। जिनमें से मुख्य रूप से इम्यूनिटी वीक होना, बुखार, उल्टी-दस्त, धड़कन तेज होना, मांस-पेशियों में दर्द होना,ब्लड प्रेशर कम होना, कम वजन होना, झटके लगना आदि था। वर्ष 1884 में रॉबर्ट कॉख नामक वैज्ञानिक ने बताया कि हैजा वाइब्रियो कॉलेरी जीवाणु के कारण होता है। लेकिन इसकी वैक्सीन का पता लगाने में वो असमर्थ पाए गए । करीब 75 सालों तक दुनिया को इसका सामना बिना किसी दवाई के करना पड़ा।
इसके बाद भारत के वैज्ञानिक शंभूनाथ डे ने इसका तोड़ दुनिया को दिया। इस बात की जानकारी दी कि वाइब्रियो कॉलेरी छोटी आंत में जाकर एक टोक्सिन छोड़ता है। जिसकी वजह से इंसान के शरीर में खून गाढ़ा होने लगता है और पानी की कमी होने लगती है और पीड़ित व्यक्ति की मौत हो जाती है।
प्लेग:

प्लेग से हुई मौत को आमतौर पर ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता है। ब्लैक डेथ 1720 में अस्तित्व में आया। और इसने करीब 15 करोड़ लोगों को अपनी चपेट में लेकर मौत से रू ब रू कराया था।

Pleg Virus
प्लेग वायरस की सांकेतिक तस्वीर
इस बीमारी ने अफ्रीका और एशिया में कहर बरपाया था। दरअसल, प्लेग चूहों से  फैलता है और फिर इससे मनुष्य संक्रमित हो जाता है। यह जहाजों के जरिए पूरी दुनिया तक पहुंचा। इसका मुख्य स्रोत पोत बने, जहां चूहों का होना आम बात है। इस तरह इसे रोक पाना काफी कठिन हो गया था। रिकार्ड मानें तो प्लेग की वजह से 14 वीं सदी में यूरोप की एक तिहाई आबादी मारी गई थी।
प्लेग की बीमारी “येरसीनिया पेस्टिस” नामक एक बैक्टीरिया के संक्रमण से होती है। प्लेग दो प्रकार का होता है – न्यूमॉनिक और ब्यूबॉनिक। इसके  मरीज़ की सांस और थूक के ज़रिए उनके संपर्क में आने वाले लोगों में भी प्लेग के बैक्टीरिया का संक्रमण हो सकता है। इसके खास लक्षणों की बात करें तो इसकी वजह से ‘लिम्फ़’ ग्रंथियों में सूजन, बुख़ार, सांस लेने में तकलीफ और खांसी है।

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