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जानें क्या है डीपफैक टेक्नोलॉजी और क्या होता हैं इससे?

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सांकेतिक तस्वीर

Pooja cloths house

आप सभी ने  जुड़वा, गोपी-किशन, डुप्लीकेट और सीता-गीता जैसी फिल्में तो देखी होगीं। जिसमें हीरो/ हीरोइन के हम शक्ल होते हैं। इन फिल्मों को शूट करने में हीरो को ही कई बार शूटिंग करनी होती थी या डबल बॉडी का इस्तेमाल होता था। लेकिन आज  तकनीक का इस्तेमाल महिलाओं और राजनैतिक नेताओं के खिलाफ उनके फेक(डुप्लीकेट)  फोटो/वीडियो बनाने में हो रहा है। जो ब्लैक मिरर के किसी एपिसोड सा प्रतीत होता है।deepfake

 

एक उदाहरण से आपको समझाते हैं, कुछ समय पहले भाजपा ने चुनाव के दौरान दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी का 45  सेकंड का वीडियो जारी किया था। जिसमें मनोज हरियाणवी हिंदी में मतदाताओं से अपील करते हैं। जबकि मनोज खुद हरियाणवी नहीं बोलते हैं। असल में  चुनाव अभियान में डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल करके वीडियो बनाई गई।  जिसमें चेहरा तो मनोज तिवारी का ही था, लेकिन उनकी आवाज़ नकली थी। ये कोई पहला वाक़या नहीं है इससे पहले भी इस तकनीक  का इस्तेमाल कई जगह किया का चुका है।

जून 2018 में रेनपाडा में प्रवासी श्रमिकों पर लोगों के एक समूह ने कथित रूप से गलत काम करने वाले व्यक्तियों की  छवियों को प्रसारित किया गया था। जिसका उपयोग भीड़ हिंसा को सही ठहराने के लिए किया गया था। 2017 में, रेडिट के एक उपयोगकर्ता ने कई मशहूर हस्तियों के अशलील वीडियो  सोशल मीडिया पर पोस्ट किए।  हालांकि, ये असली वीडियो नहीं थे।

-डीपफेक क्या हैऔर इसके लिए क्यों चिंतित होना चाहिए?

डीपफ़ेक ‘ह्यूमन इमेज सिंथेसिस’ नाम की टेक्नोलॉजी है। जिसका आधार  डीप लर्निंग है।  यह  फेक न्यूज से एक कदम आगे  ले जाता है।  यह आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का एक पार्ट है। जो लोगो को यह कहने और देखने के लिए डिजिटल रूप से मजबूर करते है, जो वास्तव  में कभी होता ही नहीं है। आसान भाषा में कहें तो व्यक्ति के चेहरे में फेरबदल कर, बोलऔर होंठ  को कॉपी किया जाता है। इस तकनीक का नकारात्मक उपयोग भारत समेत लगभग सभी देशों में हो रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डीपफेक वीडियो का जवाब दिया। भारतीय पत्रकार राणा अय्यूब भी इससे पीड़ित थीं। सिक्योरिटी फर्म सिमेंटेक ने पाया कि इससे दुनिया भर में लाखों डॉलर का नुकसान हो चुका है।

सांकेतिक तस्वीर

-जानें डीपफेक कैसे काम करता है

आमतौर पर किसी विशेष व्यक्ति की तस्वीरों और वीडियो का अध्ययन करके, एक गहन शिक्षण प्रणाली एक प्रेरक समकक्ष का उत्पादन कर सकती है। थॉट लीडर बैरेट ने बताया कि एक बार जब एक प्रारंभिक नकली का उत्पादन किया जाता है। तो GANs (जेनेरिक एडवरसैरियल नेटवर्क) नामक विधि इसे औऱ अधिक विश्वसनीय बनाती है। यह प्रक्रिया जालसाजी में खामियों का पता लगाने की कोशिश करती है। जिससे खामियों को दूर करने में सुधार होता है।

-डीपफेक तकनीक का खतरा

डीपफेक हमारे समाज, राजनैतिक व्यवस्था और व्यापार के लिए बड़ा खतरा है। क्योंकि वो पत्रकारों पर नकली खबरों पर फिल्टर का दबाव डालते हैं।  प्रचार – प्रसार और  चुनावों में  हस्त क्षेप के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा एवं लोगो और संगठनों के लिए साइबर सुरक्षा का सवाल भी पैदा करते हैं। अभी तक इसका इस्तेमाल मनोरंजन के लिए किया जाता था। लेकिन अब राजनीति में भी होना शुरू हो गया है, जो लोकतांत्रिक सुरक्षा का सवाल खड़ा करता है।

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सांकेतिक तस्वीर

भारत में फेक न्यूज ने पहले ही अपने पैर पसारे हुए है, फेक न्यूज नई चीज नहीं है। गुमराह करने के लिए गलत सूचनाएं फैलाने की रणनीति बहुत पुरानी है। जो समय के साथ साइकोलॉजिकल ऑपरेशंस में बदल गई है। खबरें हिंसक होती जा रही है, आगजनी से लेकर हत्या खुलेआम हो  रही है। इसका आधार है सोशल मीडिया जो समाज को बांटने और आपसी विश्वास में दरारें डालने का काम कर रही हैं। मोब्लिंचिंग इसका पारदर्शी उदहारण है। जहां पर लोगों को खबर क्या है, कौन उसमें शामिल है, उसके फ़ायदा, नुकसान कुछ नहीं पता लेकिन  वो उसका अभिन्न हिस्सा बनते हैं। रेजिना विश्वविद्यालय (कनाडा) के एमआईटी और गॉर्डन पेनीयुक के डेविड रैंड जैसे शोधकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया के व्यापक उपयोग में दिमागी कश्मकश की कमी है।  लोग अब दलील, बहस करके किसी ख़बर को जज करने की कोशिश नहीं करते हैं और ना ही मिली हुई जानकारी को क्रॉस चेक करते हैं। ऐसे में डीपफेक के उपयोग से अराजकता  अपने चरम पर होगी।

-डीपफेक से कैसे निबटें

बुद्धिजीवियो का मानना  है कि आज के दौर में हम सभी ‘नॉलेज सोसायटी’ का हिस्सा हैं। जिसमें ज्ञान के एक बड़े हिस्से को समाज के सभी वर्गों तक पंहुचाने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी मीडिया पर है। सिल्वी और वुड्रो हर्ट्ज़ोग लेखक- प्रोफेसर,नॉर्थ-ईस्टर्न यूनिवर्सिटी, स्कूल ऑफ लॉ का मानना है कि लोगो का विश्लेषणात्मक स्तर पर विकास होना जरूरी है। यदि  सकारात्मक, विचरात्मक और विकासात्मक सूचनाओं  का प्रवाह तेज़ी से हो तो ये एक क्रांति का आकार ग्रहण कर लेती है।

 -इससे निबटने का ‘डिजिटल लिटरेसी’ ही आदर्श जवाब है-

जो डीपफ़ेक को फैलने से रोक तो नहीं सकती है। लेकिन यह निश्चित रूप से उनके प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है। भारत में ‘मीडिया साक्षरता’ पर कितना काम हुआ है और इसके क्या परिणाम दिखाई दे रहे हैं। अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी। डिजिटल साक्षरता में मोबाइल, कंप्यूटर और ऑनलाइन भुगतान करना ही शामिल नहीं है, बल्कि डिजिटल मीडिया के  माध्यम से जानकारी लेना, देना, उसे समझना और विश्लेषण करके उसे पढ़ने योग्य बनाना और भेजना आदि भी शामिल है।   डिजिटल रूप से साक्षर व्यक्ति कंप्यूटर / डिजिटल एक्सेस डिवाइस (जैसे टैबलेट, स्मार्ट फोन) संचालित करने, ईमेल भेजने और प्राप्त करने, इंटरनेट ब्राउज़ करने, सरकारी सेवाओं का उपयोग करने, सूचना की खोज करने, कैशलेस लेनदेन करने आदि करने और इसलिए आईटी का उपयोग करने में सक्षम तो होंगे ही दूसरी ओर वो ये समझने मै भी सक्षम होंगे। जिसमें क्या सही है , क्या ग़लत है इसे आगे फॉरवर्ड करना सही रहेगा या नहीं। डिजिटल साक्षरता का उद्देश्य यह जानना है कि डिजिटल मेसेज कैसे बनाए जाते हैं।

-सूचना के क्षेत्र में विकास

सूचना के क्षेत्र में विकास का पहला स्तर है जमीनी स्तर पर डिजिटल शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुभव। डिजिटल मीडिया का यूज पत्रकार को ही नहीं बल्कि आम आदमी तक को होना भी चाहिए। हर गली , मोहल्ले, कूचे, बीहड़ और गांव को एक सूचना सूत्रधार में बांधना ही डिजिटल लिटरेसी का उद्देश्य है।  वहीं दूसरा स्तर है डिजिटल अधिकारों और जिम्मेदारियों को जानना। संचार माध्यमों द्वारा आम लोगों को साक्षरता से जोड़ने का प्रयास जारी रखा जाना चाहिए।

-डिजिटल लाइब्रेरी और मीडिया साक्षरता

जैसे कि फेसबुक ने डिजिटल लिटरेसी लाइब्रेरी 2018 में 70 ऑर्गनाइजेशन के साथ मिलकर लॉन्च की थी। जिसमें भारत भी शामिल था। इस लाइब्रेरी का उद्देश्य डिजिटल साक्षरता को संबोधित करने और युवाओं में डिजिटल तकनीक का सुरक्षित रूप से  कौशल का निर्माण करने में मदद करना है। स्कूली स्तर पर  एनसीईआरटी के अलावा अन्य संस्थाओं, स्कूलों के अलावा बड़ी संख्या में अध्यापकों और शिक्षा-शोध सभी को एक साथ कार्यशाला नियमित रूप से देश के कोने कोने में करनी चाहिए।

मीडिया अध्ययन और मीडिया साक्षरता पर गंभीरता से विचार करने पर पाएंगे कि इन दोनों का उद्देश्य मीडियाकर्मी ही तैयार करना नहीं  है। बल्कि तथ्य से सत्य तक पहुंचना के साथ सभी का विकास करना भी है। इन दिनों कुछ फर्जी खबरों की सत्यता को सत्यापित करने के लिए लाखो खबरें से होकर गुजरना पड़ता है। जो जल्दी से होने वाला काम नहीं है।  इसलिए जरूरी है  जो लोग समाचार पढ़ रहे हैं या दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। उनके साथ समाचार साझा करना उनके लिए डिजिटल साक्षरता से होकर जाना एक कर्तव्य है।  स्कूल, कॉलेज, क्लब, पंचायतों और राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल साक्षरता जागरूकता अभियान शुरू किया जाना चाहिए। जिससे लोग नकली और असली फोटो, वीडियो ओर खबर में अंतर को समझ सकें और उनके बारे में सोचना शुरू करें। इससे नकारात्मक प्रभाव से बचा सकता है।

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Prachi Rathi

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