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हिंदी पत्रकारिता का उदय है ‘उदंत मार्तण्ड’

उदंत्त मार्तण्ड

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 पत्रकारिता वह माध्यम है जो नागरिकों और शासन के बीच संवाद और मुद्दों का आदान-प्रदान करती है। पत्रकारिता अगर जिम्मेदारी के साथ न की जाए तो बड़ी गलतफहमियां हो सकती है। जो नागरिक, समाज और शासन सबके लिए नुकसान का कारण बन सकती है।
“लोकतंत्र की सफलता या विफलता उसकी पत्रकारिता पर निर्भर करती है”- स्कॉट पेली

उदंत्त मार्तण्ड

भारत में  हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। 30 मई को हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड प्रकाशित किया गया था। इस समाचार प्रकाशन को वर्ष 2020 में 193 वर्ष पूरे हो चुके हैं। हिंदी भाषा में पहला समाचार पत्र 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर द्वारा कलकत्ता से शुरू किया गया था। वे इसके संपादक और प्रकाशक खुद ही थे। हिंदी पत्रकारिता में किशोर जी को विशेष दर्जा प्राप्त है। जानिए कुछ खास पहले हिंदी समाचार पत्र के बारे में…

1. उदंत मार्तण्ड’ का अर्थ है ‘उगता सूरज’ और समाचार उदय यह अखबार उस समय निकाला गया। जब अंग्रेजी, बंगला, पारसी ओर फारसी में सबसे ज्यादा अखबार प्रकाशित होते थे। लेकिन हिंदी पत्रकारिता की नींव को मजबूत बनाने के लिए जुगल किशोर ने इसे प्रकाशित करना शुरू किया। उस वक्त हजारों की संख्या में लोग इस पत्र को पढ़ने लगे।

2. यह समाचार पत्र हर मंगलवार को प्रकाशित किया जाता था।सबसे पहले अंक की 500 प्रतियां छपी। क्योंकि यह एक साप्ताहिक अखबार था।

3. जुगल किशोर  पैशे से एक वकील थे। जो कानपुर, उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते थे। जो हिंदी भाषी जनता को अधिक प्रेम करते थे। तभी से उन्होंने अपने दोस्त मुन्नू ठाकुर के साथ हिंदी समाचार निकालने का निश्चय किया। उन्हें 16 फरवरी 1826 को  इसे प्रकाशित करने का लाइसेंस प्राप्त हुआ। लेकिन 30 मई 1826 को आधिकारिक रूप से यह एक हिंदी साप्ताहिक अखबार के रूप में जाने जाना लगा।

4 उस समय अखबारों को डाक से पहुंचाया जाता था। इस अखबार में खड़ी बोली और ब्रजभाषा का इस्तेमाल किया जाता था। उदंत मार्तण्ड ने समाज के विरोधाभासों पर तीखे कटाक्ष किए थे

5. उदंत मार्तण्ड’ एक प्रयोग था और यह पहला समाचार पत्र था। जो एक साल भी पूरा ना कर सका। एक तो हिंदी पाठकों की कमी और दूसरी हिंदी पाठकों के लिए इसे डाक द्वारा पहुंचाया जाता यह तो उस वक्त के हिसाब से महंगा साबित होने लगा।पंडित जुगल किशोर ने कुछ रियायत का भी आह्वान किया। लेकिन ब्रिटिश सरकार इसके पक्ष में नहीं थी और आखिरकार इसे दिसंबर 1826 में ही बंद करना पड़ा।

6 उस समय समाचारों को बस इसलिए बंद करना पड़ता था। क्योंकि आर्थिक रूप से कोई इतना सक्षम नहीं होता था। लेकिन समाज से परतंत्र की बेड़ियों को तोड़ना और समाज को एक निष्पक्षता, ईमानदारी और जवाबदेही के रास्ते पर ले जाना ही एक सच्चे पत्रकार का उद्देश्य माना जाता है। जो उस समय के पत्रकारों ने भली भांति करके दिखाया था।

7 आज की पत्रकारिता को देखे तो सब कुछ ही बदल चुका है। कहते हैं नए दौर का नए पत्रकार हैं तो बदलना लाजमी था। अगर आज भी आपका लक्ष्य दुनिया बदलने का है। तो पत्रकारिता इसके लिए एक आपातकाल औजार है।

पत्रकार को किसी का कोई पक्षधार के रूप में नहीं बल्कि अपनी सूझ बूझ के साथ निर्भीक, बेबाक ओर निष्पक्ष होकर कदम उठाने चाहिए। अगर एक कलम किसी की सोच बदल सकती है। तो एक  पत्रकार समाज को बदलने का साहस भी रखता है।

Written by: Prachi Rathi
YUVA BHARAT SAMACHAR

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