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अलग हटके प्राचीन

बिना आलू वाले समोसे देखें हैं आपने…जानें क्या है इसका राज़?

साकेंतिक चित्र
Pooja cloths house

बिना आलू के समोसे सुनना ही ऐसा लगता है जैसे कि बिन मीठे मिठास और बिना तीखे की मिर्ची। ऐसे समोसों को खाना अपनी जिह्ववा और अपने पेट के साथ अन्याय करने से कम नहीं। हालांकि आजकल बाज़ार में कई प्रकार के समोसे मिलने लगे हैं। कभी समोसे के अंदर मैगी तो कभी चॉकलेट और पनीर देखने को मिलने लगे हैं। और तो और नमकीन नाश्ते के लिए ले जाने वाले समोसो को मिठाई की श्रेणी में भी डाल दिया गया है। आज मार्केट में मीठे समोसे भी उपलब्ध है, जिसके अंदर मावे और मेवों के मिश्रण को भर दिया जाता है। लेकिन फिर भी ना जाने क्यों हमारे लिए समोसे का अस्तित्व और स्वाद आलू के होने से ही है।

आलू के समोसे

इसमें कोई दोराय नहीं कि समोसा पहले से ही हमारे खानपान का अभिन्न हिस्सा रहा है। अगर 15वीं शताब्दी की बात करें, तो उस समय में भी समोसे को उतना ही पसंद किया जाता था। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि 15वीं शताब्दी में आलू और समोसे का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद निमतनामा नाम की एक किताब में आठ तरह के समोसों के बारे में बताया गया है, जो उस वक्त बना करते थे। कमाल की बात ये थी कि उन आठ तरह के समोसों में से किसी एक में भी आलू का इस्तेमाल नहीं किया गया था।

क्या है निमतनामा?
दरअसल निमतनामा 15वीं शताब्दी की एक ऐसी किताब है जो पांडुलिपि की एकमात्र प्रति है। निमतनामा किताब को दि बुक ऑफ डिलाइट्स भी कहा जा सकता है। इस किताब में कई प्रकार के खाद्य और पेय पदार्थों के बारे में उल्लेखित है। निमतनामा में स्टू, भुना हुआ कबाब, मसालेदार शोरबा, साग, शर्बत, मिठाईयां और समोसे के बारे में बताया गया है। असल में ये सभी वे व्यंजन है जो सुल्तान गियासुद्दीन शाह के लिए पकाएं जाते थे। जिन्होंने सन 1469-1500 तक मालवा पर शासन किया था।

बिन आलू समोसा… बहुत नाइंसाफ़ी है

सांकेतिक चित्र

वैसे 15वीं शताब्दी के समोसे में आलू का ना होना लाज़मी है क्योंकि ऐसा माना जाता रहा है कि भारत में आलू का आगमन 16वीं सदी में पुर्तगलियों के आगमन के साथ ही हुआ था। टमाटर भी उसी वक्त भारत में आया था। और शायद इसी कारण सुल्तान गियासुद्दीन शाह को आलू के बिना ही समोसे खाने पड़े।

कैसे बनते थे 15वीं शताब्दी के समोसे?
उस दौर के नमकीन समोसों में आलू की जगह मसालें, गुलाबजल युक्त मीट कीमा, घी में पकाये गेंहू भरे जाते थें। वहीं मीठे समोसे में मसालेदार क्रीम, नारियल और सुखे मेवों का इस्तेमाल किया जाता था। यानि की उस वक्त के समोसे भी काफ़ी लजीज़ हुआ करते थे। आप भी चाहें तो एक बार बना कर देख सकते है। यकीनन, कोई भी समोसा  कितने भी टेस्टी क्यों न हो, लेकिन आलू के समोसे और एक कप चाय का मुकाबला नहीं कर सकते।

 

अगर आपके पास भी ऐसी कोई मसालेदार सी रेसेपी है तो आप हमें अपने नाम, पते और पासपोर्ट साइज के फोटो के साथ हमें eyuvabharat@gmail.com पर मेल कर सकते हैं।

Written by: Vanshika Saini
YUVA BHARAT SAMACHAR
MahaLaxmi group of institution
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