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यूंहीं नहीं मिली आजादी, पढ़िए जवानों की जांबाजी

15 august

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आज वो दिन है जिसका हमें 200 सालों से इंतजार था। वो दिन जो हमारे लिए स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया। जिसके लिए हमारे अपनों ने अपने बचपन,जवानी और जीवन की हर खुशी को दांव पर लगा दिया ताकि हम बेड़ियों से मुक्त हो सके।वो बेड़ियां जिन्होंने हमसे हमारा अस्तिव ही छीन लिया था लेकिन हमारे वीरों ने जो किया उसके लिए उन्हें दिल से सलाम….

आजादी का वो साल 1947 जब हमें ब्रिटिश इंडिया कंपनी से मुक्त होना था लेकिन उस समय जो युद्ध हुआ वो भी यादों में रह गया। यादों में रह गई वो कुर्बानी, जिसने पिंजरे की दीवारों को तार तार कर दिया। बात उस समय की जब 200 सालों तक गुलामी सहकर वक्त आया था आजादी का। वक्त आया था फिर से खुलकर जीने का लेकिन शांति भाव से नहीं मिली आजादी। विभाजन हुआ भारत का और हिस्सा बना पाकिस्तान और हिंदूस्तान। बंट गया सब कुछ। दिल्ली की सडकों पर एक तरफ ख़ुशी का माहौल था तो दूसरी तरफ लाशें पड़ी थी और औरतों की अस्मत लूटी जा रही थी। विभाजन हुआ और बढ़ गई हिंसा। करीब 5 लाख मारे दिए और 1.45 करोड़ के करीब शरणार्थियों अपना घर छोड़कर भटक गए।1947

1947 का युद्ध

1947 में आजादी मिलने के बाद भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के दुश्मन बन गए और अक्टूबर,1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। उस वक्त कश्मीर के राजा हरिसिंह केवल किसी भी देश में विलय नहीं करना चाहते थे लेकिन पाकिस्तान ने कबायली सेना को भेज दिया और भयानक युद्ध हुआ। जिसमें 1500 भारतीय मारें गए और 3500 लोग घायल हो गए। 30 दिसंबर 1947 को भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को ले गए। 13 अगस्त 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव पारित किया और 1 जनवरी 1949 को युद्ध विराम की घोषणा की।

1965 का युद्ध

हम भारतीयों के जीवन में दुखों का सिलसिला बंद नहीं हुआ था। पहले ही देश के वीरों का शहादत ने देश को सदमा दिया था लेकिन 1947 के बाद फिर से एक बार 1965 में युद्ध छिड़ गया और मुद्दा फिर भी वहीं रहा कश्मीर। पाकिस्तान चाहता था कि कश्मीर की आवाम को भारत के खिलाफ भडकाया जाए और एक बार फिर से अप्रैल 1965 में युद्ध हुआ। जो पांच महीने तक चला और हजारों लोगों का खून बहा। हर युद्ध में क्षति हुई तो उन लोगों की जो बिना किसी कसूर के मारें गए।

जनवरी 1965 में पाकिस्तान ने कच्छ के रण में ऑपरेशन डेजर्ट हॉक लांच कर भारतीय जमीन हड़पने की कोशिश की।

अप्रैल 1965 में दोनों देशों ने एक-दूसरे की चौकियों पर हमला शुरू किया।

5 अगस्त 1965 को 26000 से ज्यादा पाकिस्तान सैनानियों ने जम्मू कश्मीर की रेखा लांघी।

और 15 अगस्त 1965 को भारतीयों जवानों ने सरहद लांघकर हमला किया।

युद्ध में भारत के 2,862 सैनिकों ने अपने प्राणों की आहूति दी।

22 सितंबर को UN की दखलअंदाजी के बाद युद्ध विराम घोषणा हुई।

विपता पर विपता आती गई और युद्धों का सिलसिला ना थमा…अभी पिछले युद्धों के घाव भरे भी ना थे कि 1971 में फिर से जंग छिड़ गई। उस दौरान पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान में मतभेद होना शुरू हो गया।जिसके बीच में भारत इसलिए आया क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान के लोग भारत में आकर बस रहे थे। जिन्हें भारत में पड़ोसी होने के नाते सुविधाएं दी जा रही थीं और पाकिस्तान को ये बिलकुल रास ना आया। पाकिस्तान ने भारत पर हमला करने की धमकियां दी। परिणाम ये हुआ कि अपनी खुन्नस निकालने के लिए पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारत पर हमला कर दिया और पूर्वी पाकिस्तान में हुए इस युद्ध में पाक को मुंह की खानी पड़ी। 5 दिसंबर को भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर जबरदस्त बमबारी कर पाकिस्तानी नौसैनिक मुख्यालय को तबाह कर दिया। पाकिस्तान पूरी तरह घिर चुका था। इसी बीच इंदिरा ने बांग्लादेश को मान्यता देने का एलान कर दिया। इंदिरा की इस घोषणा का मतलब था कि बांग्लादेश अब पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र होगा। भारत ने युद्ध में जीत से पहले ही ये फैसला इसलिए किया जिससे युद्धविराम की स्थिति में बांग्लादेश का मामला यूनाइटेड नेशन्स में लटक ना जाए।

1971 में हुआ विजयी भारत

पाकिस्तानी सेना का नेतृत्व कर रहे थे। जनरल एके नियाजी ने हार स्वीकार करते हुए अपने 93 हजार सैनिकों के साथ भारतीय सेना के कमांडर ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया था। भारत की तरफ से जनरल सैम मानेकशॉ उस समय सेना प्रमुख थे। इस जंग के बाद विश्व मानचित्र पर नये देश ने रूप लिया, जिसे बांग्लादेश नाम मिला।

आजादी की कहानी जितना दर्दनाक थी। उतनी ही आजादी के बाद भी रही। एक बाद एक युद्ध ने दोनों देशों को एक दूसरे का ऐसा दुश्मन बना दिया। जिसकी आग आज तक भी ठंडी ना हो पाई और पाकिस्तान ने फिर अपनी नापाक हरकत की। साल 1999 में कारगिल में हमला कर जंग छेड़ दी। पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार था। पाकिस्तान की सेना ने भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। लगभग 30,000 भारतीय सैनिक और 5,000 घुसपैठी कारगिल में शामिल थे। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर हमला किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर किया. और हर बार की तरह करगील युद्ध में भारत की जीत हुई।KARGIL VIJAY DIVAS

1999 कारगिल युद्ध

26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जांबाजी का उदाहरण दिया। करीब 18 हजार फीट की ऊँचाई पर कारगिल में लड़ी गई इस जंग में देश ने लगभग 527 से ज्यादा वीर योद्धाओं को खोया था वहीं 1300 से ज्यादा घायल हुए थे।

1947 में आजाद होने के बाद भी भारत ने युद्धों के दंश को झेला और लाखों वीरों को खो दिया। लेकिन उनकी वो शहाहद इतिहास के पन्नों में जड़ दी गई। जो सदियों तक याद रखी जाएगी। लेकिन मलाल होगा तो सिर्फ इस बात का कि युद्ध पर युद्ध होते रहें और मासूमों की जान जाती रहीं।

Written by: POOJA SAHANIYA

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