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आपका दिल चुरा ले जायेगा चंबा का अचंभा


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आप भारत में रहते हो, प्रकृति प्रेमी हो और फिर भी अगर हिमाचल प्रदेश के चंबा से बेखबर हो। तो मुझे आपकी देशभक्ति और आपके प्रकृति प्रेम पर सवाल खड़ा करना गलत नहीं लगता।
सच कहूं तो, चंबा का चप्पा-चप्पा एक अलग कहानी कहता है, एक अलग सा राग अलापता है। और तो और यहां का मौसम कब अंगलाई ले लें इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। वैसे तो यहां का मौसम ज्यादातर बेईमान ही रहा करता है। कब आपका दिल आपके बस से बेबस हो जाएं, और आप अपने आप ही शक कर बैठे ये कोई नहीं कह सकता। वैसे आपको बता दें कि चंबा और शक का काफी गहरा रिश्ता रहा है। वो कैसे, आइए, जानते है…
दरअसल, चंबा की भी अपने आप में एक कहानी है जो कि कुछ ये कहती है कि यहां की राजकुमारी चंपावती रोजाना स्वाध्याय के लिए एक ऋषि के पास जाया करती थीं। इसपर उनके पिता साहिल वर्मा को उनपर शक हुआ। उन्होंने अपनी बेटी का पीछा किया और आश्रम में सबकुछ सामान्य पाकर उन्हें अपनी करनी पर पछतावा हुआ। लेकिन राजकुमारी को इस बात से बेहद आघात पहुंचा और उन्होंने अपने पिता को त्याग दिया।
इस घटना के बाद वहां एक आकाशवाणी हुई जिसमें राजा को उस स्थान पर मंदिर बनवाने का आदेश दिया गया था। तभी राजा साहिल ने चौगान मैदान के पास अपनी बेटी के नाम से ही मंदिर बनवाया। इस मंदिर को चंपावती मंदिर व चमेसनी देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। साथ ही राजा ने अपने राज्य का नाम भी चंपावती के नाम पर ही चंपा रखा। लेकिन आज ये स्थान चंबा के नाम से जाना जाता है।
चंबा के अतीत के पन्ने
यूं तो चंबा को मंदिरों की नगरी कहा जाता है। यहां लगभग 75 प्राचीन मंदिर हैं। लेकिन अगर आपको यहां के इतिहास और संस्कृति के बारे में जानना हो तो आप यहां के संग्रहालय को देखने जरूर जाये। जिसका नाम भूरी सिंह संग्रहालय है। यहां आपको मिनिएचर पेंटिग, गुलेर शैली की पेंटिंग, श्वेत श्याम तस्वीरें और विभिन्न राजाओं के संधि पत्र भी देखने को मिलेंगे। जिससे आपको अतीत के पन्नों से रू ब रू होने का मौका मिलेगा।
क्या है खास?
वैसे तो यहां की हर चीज अपनी अलग कहानी पेश करती है लेकिन यहां के खास किस्म के रूमाल काफी प्रसिद्ध है। अब आप सोच रहें होगें कि रूमाल कैसे खास हो सकते हैं… दरअसल, यहां के रूमाल आम रूमालों की तरह जेब में रखने के लिए नहीं होते। बल्कि यहां के रूमालों पर श्रीकृष्ण की पूरी रासलीला को अंकित किया जाता है। जिसकी शुरुआत माहेश्वरी देवी ने की थीं। यहां पर रूमालों पर बुनाई का काम पिछले कई सैकड़ों सालों से किया जाता है। और ये रूमाल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करके ही दम लेते है। इसी संबंध में 1965 में यहां के रूमालों की कलाकारी और सुंदरता के लिए माहेश्वरी देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था।
कैसे जाएं चंबा?
चंबा जाने के लिए सबसे पहले आप पठानकोर्ट एयरपोर्ट पहुंचे क्योंकि ये एयरपोर्ट चंबा से सबसे नजदीक (120 किमी) है। आप चाहे तो पठानकोर्ट रेलवे स्टेशन पहुंचकर भी चंबा पहुंच सकते है। और उसके बाद आप आसानी से बस या टैक्सी से चंबा की ओर सफर कर सकते हैं।
आप भी एक बार चंबा जरूर घूमकर आयें। यकीनन, यहां की खूबसूरती आपको मोहित कर देगी।

Written by: Vanshika Saini

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