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नंदा देवी माता मंदिर: ऐतिहासिक यात्रा की 10 खास बातें

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भारत में देवी-देवताओं को बड़ी ही श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा जाता है। यहां पर लाखों की संख्या में मंदिर बने हैं और सभी का अपना एक विशेष महत्व है। उन्हीं मंदिर में से है, एक बड़े ही चमत्कारी मंदिर के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं। इस मंदिर का नाम नंदा देवी है। माना जाता है जिसकी यात्रा करने से बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। आइए जानते हैं इस मंदिर की ऐतिहासिक यात्रा के बारे में…

नंदा देवी माता मंदिर

जोशीमठ के तपोवन क्षेत्र के उत्तराखंड के चमोली जिले में नंदा देवी का सबसे ऊंचा पहाड़ है। यहां दो बड़े ग्लेशियर है- नंदादेवी नॉर्थ और नंदा देवी साउथ,जो कि पिघलकर एक नदी का रूप ले लेती है। इनकी शुरुआत नंदा देवी की चोटी से ही हो जाती है, जो नीचे घाटी तक आती हैं। दोनों की लंबाई 19 किलोमीटर है।

ऐतिहासिक यात्रा की 10 खास बातें

1. नंदा देवी ही माता पार्वती है
नंदा देवी को हिमालय की पुत्री कहा गया है, अर्थात वे माता पार्वती हैं, और यहाँ के लोग नंदादेवी को अपनी अधिष्ठात्री देवी मानते हैं।

2. गढ़वाल-कुमाऊं का मिलन
माना जाता है कि इस यात्रा के माध्यम से देवी कुमाऊं अपने ससुराल कैलाश पर्वत जाती हैं। बता दें कि देवी कुमाऊं कत्युरी राजवंश की इष्टदेवी है और उनकी इस यात्रा को गढ़वाल-कुमाऊं के सांस्कृतिक मिलन का प्रतीक भी माना जाता है।

3. सबसे ऊंची चोटी
नंदा देवी पर्वत लगभग 25,643 फीट ऊंचा है। नंदा देवी पर्वत भारत की दूसरी एवं विश्व की 23वीं सर्वोच्च चोटी है। वहीं आपको बता दें कि नंदा देवी की कुल ऊंचाई 7816 मीटर यानी 25,643 फीट है। नंदा देवी की चढ़ाई अत्यधिक कठिन मानी जाती है।

4. 12 साल में एक बार होती है यात्रा
प्रतिवर्ष भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में नंदादेवी मेला प्रारंभ होता है। यहां तक पहुंचने के लिए प्रत्येक 12 वर्ष में एक धार्मिक यात्रा का आयोजन होता है।

5. हिमालयी कुंभ
इसे हिमालयी कुंभ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस यात्रा का आयोजन कुंभ की तरह हर बारह वर्ष के बाद होता है।

6. आदि शंकराचार्य ने की पहली बार यात्रा
इस यात्रा की शुरुआत आदि शंकराचार्य ने ईसा पूर्व की थी। नंदा देवी राजजात यात्रा को विश्वे की सबसे लम्बी पैदल और धार्मिक यात्रा माना जाता है।

7. यात्रा का प्रारंभ और अंत
18 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है ये ऐतिहासिक यात्रा जो चमोली जनपद के नौटी गांव से शुरू होती है। जो रूपकुंड होकर हेमकुंड तक जाती है।

8. रोमांचक और खतरों से भरी यात्रा
इस यात्रा की सीमाएं चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों से जुड़ती हैं। इस 280 किमी लंबी है और इस धार्मिक यात्रा के दौरान रास्ते में घने जंगल, पथरीले मार्गों व दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों को पार करना पड़ता है,जिसमे कई प्रजातियों के जीव-जंतु रहते हैं।

9. 19 दिन में पूर्ण होती है यात्रा
इस यात्रा के 19 पड़ाव है। रास्ते में विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा में भिन्न-भिन्न पड़ावों पर लोग इस यात्रा में मिलकर इस यात्रा का हिस्सा बनते हैं। इस यात्रा का आयोजन नंदादेवी राजजात समिति द्वारा किया जाता है।

10. यात्रा का आकर्षण चौसिंगा खाडू
इस यात्रा का मुख्य आकर्षण चौसिंगा खाडू (चार सींगों वाला भेड़) होता है, यात्रा में जाने वाले लोगों का मानना है कि यह चौसिंगा खाडू आगे विकट हिमालय में जाकर विलुप्त हो जाता है।

बता दें कि नंदादेवी के क्षेत्र कैलाश में प्रवेश कर जाता है, जो आज भी अपने आप में एक रहस्य बना हुआ है,उसकी पीठ में दो तरफ थैले में श्रद्धालु गहने, श्रृंगार सामग्री व अन्य भेंट देवी के लिए रखते हैं, जो कि हेमकुंड में पूजा होने के बाद आगे हिमालय की ओर प्रस्थान करता है।इस तरह से मां नंदा देवी की इस यात्रा में जोखिम भरा भी माना जाता है। हालांकि फिर भी लोग बड़ी ही श्रद्धा के साथ मां नंदा देवी के दर्शन के लिए जाते है। माना जाता है कि इस यात्रा को करने से सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है।

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