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जब रेडियो पर सुनाई दी थी इंदिरा की आवाज और हो गया था आपातकाल का ऐलान


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इतिहास के काले पन्नों पर लिखी तारीख 25-26 जून 1975 आज तलक भी सबसे मनहूस रातों में से एक मानी जाती है। रेडियो पर बजता वो आपातकाल का वो काला ऐलान जिसने कई लोगों की जिंदगी को वहीं थाम दिया।

25 जून 1975, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा दिन माना जाता है, जिस दिन डेमॉक्रेसी का हनन साफ साफ किया गया था। क्यूंकि आज ही के दिन देश के लोगों ने रेडियो पर एक ऐसा ऐलान सुना जिसने सब के होशोहवाश उड़ा दिए। और मुल्क में खबर फैल गई कि सारे भारत में अब आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। हालांकि आज इस घटना को पूरे 46 साल हो चुके हैं, लेकिन फिर भी लोगों के लिए ये दिन वेदनाओं से भरा हुआ ही साबित होता है।

बता दें कि उस समय भारत के राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद थे और प्रधानमंत्री के पद पर इन्दिरा गांधी विराजमान थी। इन दोनों के नेतृत्व में ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की गई थी। जैसे ही 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि का समय हुआ वैसे ही राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मंजूरी व हस्ताक्षर के साथ ही देश में पहला आपातकाल लागू किया गया था।

और अगली सुबह रेडियो पर पूरे देश ने कुछ ऐसा सुना जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी ना की थीं। अचानक से देश में शोक की लहर दौड़ गई और प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की आवाज़ आई कि भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। और ये आपातकाल देश में पूरे 21 महीनों (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977)  तक लगा रहा। जो कि अपने आप में बहुत बड़ा समयकाल था।

बड़े नेताओं की भी हुई थी गिरफ्तारी

आपातकाल की घोषणा के साथ ही 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था। जिनमें जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस आदि बड़े नेता शामिल हैं।

यही वो दौर था जब सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों तक को भी निलंबित कर दिया गया था। यहां तक की लोग अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार भी खो चुके थे। कोई भी कुछ भी नहीं कह सकता था। इसी के साथ लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया था। इसी बीच गिरफ्तारी का आलम कुछ यूँ था कि कारागार में जगह   तक नहीं बची थीं।

मीडिया पर लग गई थी सेसंरशिप

यूं तो भारतीय प्रेस को पूर्ण रूप से ये छूट है कि वे समाज की, सरकार की सच्चाई को उजागर करने का काम आसानी से कर सकते थे लेकिन आपातकाल ने मीडियो को भी बेडियों में बांध दिया था। और प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी। इस दौरान सभी अखबारों को सेंसर अधिकारी के अधीन कर दिया गया था। किसी भी खबर को छापने से पहले सेंसर अधिकारी की अनुमति ली जाया करती थी। आलम ये था कि कोई भी अख़बार सरकार विरोधी समाचार नहीं छाप सकता था ऐसा करने पर गिरफ्तारी हो सकती थी।

ये सिलसिला सालों ऐसे ही चला और  जब 23 जनवरी 1977  को मार्च के महीने में चुनाव की घोषणा की गई तो उसके बाद से प्रेस फिर से स्वतंत्र रूप से काम करने लगी।

क्या लगभग हर शताब्दी में ऐसा होता ही है?

तो ये थे इमरजेंसी के प्रमुख कारण

दरअसल हुआ कुछ यूं था कि सन् 1971 में चुनाव में इंदिरा गांधी की पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का आमना-सामना हुआ। और इन चुनावों में इंदिरा गांधी की पार्टी की भारी जीत हुई। जिसपर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और  याचिका में ये आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया हैं।

इस पर मामले की सुनवाई की गई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया। जिससे इंदिरा गांधी आक्रोशित हो गई और इमरजेंसी लगाने का फैसला ले लिया गया।

आपातकाल की घोषणा 

वैसे तो इमरजेंसी की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी। पश्चिम बंगाल के सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। साथ ही राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी। इसी के साथ आरएसएस के उन सदस्यों और विपक्ष नेताओं की लिस्ट तैयार की गई, जिन्हें बाद में अरेस्ट किया गया था।

ये बात तो स्पष्ट थी कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल का फैसले बहुत ही गुस्से में लिया था क्योंकि न तो उन्होंने किसी कैबिनेट की औपचारिक बैठक बुलाई थी और आपातकाल लगाने की अनुशंसा सीधे राष्ट्रपति से कर डाली थी। जिसके बाद  25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि से देश में पहला आपातकाल लागू कर दिया गया था।

इस्तीफा देने को तैयार थीं इंदिरा

जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय  के चुनाव रद्द किए जाने के आदेश आये तो इस बात से आहत होकर इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने के बारे में सोचा था। लेकिन उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियो ने उन्हें जोर दिया की उन्हें ऐसे इस्तीफा नहीं देना चाहिए। जिसके बाद इंदिरा ने कभी अपने इस्तीफे पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए।

Written By: Asmita Shukla

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